रवीश कुमार का प्राइम टाइम : क्या जबरदस्ती विश्वनायक दिखने की सोच के बंधक हो गए हैं हम?
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हर बात में इतिहास का नायक बन जाने, ख़ुद वैसा काम न कर पाने पर किसी नायक की सबसे ऊंची मूर्ति बनवा देने की मानसिकता को वही समझ सकता है जो छपास रोग को जानता है. पत्रकारिता के भीतर इस रोग की चर्चा ऐसे लोगों के संदर्भ में की जाती है जो हर बात में छपना चाहते हैं. इसे ही छपास रोग कहते हैं. इसी बीमारी का एक इंग्लिश नाम है हेडलाइन सीकर. कुछ ऐसा देखो या करो जो हेडलाइन बन जाए. इस मानसिकता को सबसे सरल और छोटी कहानी में पकड़ा है यशपाल ने। कहानी का नाम है अख़बार में नाम. आज के प्राइम टाइम को आप अख़बार में नाम और उसके किरदार गुरदास के बग़ैर नहीं समझ सकेंगे.
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पता था कि लोगों की नजर उन बैंकों के बहिखाते पर है, जिनके यहां एनपीए लाखों-करोड़ों रुपये का हो चुका है. इस कारण बैंकों को बुरी नजर से देखा जाने लगा था. कब डूबेंगे कब क्या होगा. इसका समाधान निकाल लिया गया है.
Published 09/17/21
कानून को लेकर केंद्र और राज्य के बीच टकराव का एक नया मोर्चा नीट परीक्षा को लेकर खुल गया है. केंद्र के नागरिकता कानून, कृषि कानूनों के खिलाफ कई राज्यों की विधानसभा में प्रस्ताव पास हुए हैं. इस कड़ी में नीट की परीक्षा का मुद्दा भी जुड़ गया है.
Published 09/16/21