रवीश कुमार का प्राइम टाइम : सच छापा तो पड़ गया छापा
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अगर आप सरकार से सवाल करना चाहते हैं. आलोचना करना चाहते हैं तो पहले एक काम कीजिए. आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय, जिसे ईडी कहते हैं, उनके अधिकारियों से पूछ लीजिए कि कितना तक लिखें तो छापा पड़ेगा? कितना तक न लिखें तो छापा नहीं पड़ेगा? अभी तक चुनाव आते ही विपक्षी दलों के नेताओं और उनसे जुड़े लोगों के यहां छापेमारी होने लग जाती थी. लेकिन क्या अब खबर छापने और दिखाने के बाद या उसके कारण छापेमारी होने लगी है? आपातकाल शब्द इतना घिस चुका है, कि आप इसके इस्तेमाल से कुछ भी नहीं कह पाते हैं. काल के नए-नए रूप आ गए हैं. दूसरी लहर के दौरान हिंदी ही नहीं, अंग्रेजी अखबारों में भास्कर अकेला ऐसा अखबार है, जिसने नरसंहार को लेकर सरकार से असहज सवाल पूछे. उन बातों से पर्दा हटा दिया, जिन्हें ढंकने की कोशिश हो रही थी. इस दौरान भास्कर के पत्रकारों ने न केवल अच्छी रिपोर्टिंग की, बल्कि महामारी की रिपोर्टिंग में नए-नए पहलू भी जोड़ दिए.
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भारतीय रिजर्व बैंक और संसद की स्थायी समिति के अनुसार प्रति व्यक्ति आय के मामले में उत्तर प्रदेश और बिहार की हालत बहुत खराब है. ये दोनों ही राज्य सबसे नीचे हैं. भूगोल और आबादी के हिसाब से भी भारत के इन दो बड़े राज्यों में अगर लोगों की कमाई इतनी कम है, तो आप समझ सकते हैं कि जीवन स्तर का क्या हाल होगा?
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ऐसे बहुत से लोग हैं, जो बैंकों में बचत पर मिलने वाले ब्याज से अपना खर्च चलाते हैं. या एक निश्चित सी कमाई होती है और ज्यादातर मामलों में बहुत सीमित भी. अब अगर ये कमाई भी घटने लगे, माइनस में चली जाए तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि गोदी मीडिया पर भारत को सुपर पावर बताने की होड़ क्यों मची है?
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